Uttarakhand

कर्णप्रयाग संगम में माता अनसूया–चंडिका देवी का दुर्लभ माघ स्नान

43
×

कर्णप्रयाग संगम में माता अनसूया–चंडिका देवी का दुर्लभ माघ स्नान

Share this article

गोपेश्वर। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर पंचप्रयागों में से एक कर्णप्रयाग संगम में सती शिरोमणि माता अनसूया और चंडिका देवी के माघ स्नान के दौरान श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। वर्षों बाद दोनों देवडोलियों के परस्पर मिलन ने वातावरण को अत्यंत भावपूर्ण और ऐतिहासिक बना दिया।

दशोली विकासखंड के खल्लागांव से निकली सती शिरोमणि माता अनसूया तथा पोखरी ब्लॉक के जिलासू गांव की चंडिका देवी, अपनी-अपनी देवरा यात्राओं के तहत माघ स्नान हेतु पिंडर और अलकनंदा नदियों के संगम कर्णप्रयाग एक साथ पहुँचीं। इस दुर्लभ अवसर पर संगम स्थल पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

माता अनसूया देवी, उमा देवी मंदिर में प्रवास के पश्चात सर्वप्रथम संगम तट पर पहुँचीं, जहां विधि-विधान के साथ माघ स्नान संपन्न हुआ। देवडोली के स्नान के बाद देवी का श्रृंगार, हवन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए गए। संगम तट पूरे समय माता अनसूया के जयकारों से गूंजता रहा।

इसी क्रम में जिलासू गांव की चंडिका देवी भी देवरा यात्रा के अंतर्गत कर्णप्रयाग पहुँचीं। रात्रि प्रवास के उपरांत बुधवार को देवी ने जयघोष के साथ संगम पर स्नान किया। स्नान के पश्चात हवन एवं पूजा-अर्चना संपन्न हुई। इसके बाद दोनों देवडोलियों का परस्पर मिलन हुआ, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। संगम स्थल पर दोनों देवियों के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा।

इस ऐतिहासिक अवसर पर दूर-दराज क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने भी संगम में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित किया। इसके पश्चात दोनों देवडोलियाँ उमा देवी मंदिर पहुँचीं, जहां संयुक्त रूप से पूजा-अर्चना का आयोजन हुआ। पूजा के बाद दोनों देवडोलियाँ एक-दूसरे से विदा होकर अपने-अपने गंतव्यों की ओर रवाना हुईं। माता अनसूया की रथ डोली कर्णप्रयाग में धियाण के घर प्रवास पर रही, जबकि चंडिका देवी की देवडोली रात्रि प्रवास हेतु गलनाऊं पहुँची।

उल्लेखनीय है कि माता अनसूया की रथ डोली 51 वर्षों बाद देवरा यात्रा पर निकली है, वहीं जिलासू की चंडिका देवी भी कई वर्षों बाद इस यात्रा पर हैं। इसी कारण मकर संक्रांति पर कर्णप्रयाग संगम में दोनों देवडोलियों के एक साथ माघ स्नान ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

इस अवसर पर खल्लागांव, जिलासू, गुठगांव सहित अनेक क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। पुष्पवर्षा के साथ दोनों देवडोलियों को विदा किया गया। कई श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं तो कई भाव-विह्वल नजर आए। वर्षों बाद कर्णप्रयाग संगम में ऐसी चहल-पहल और आध्यात्मिक उल्लास देखने को मिला।

आस्था की इस अद्भुत और अनूठी बेला ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक दौर में भी लोगों की देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा और विश्वास अटूट है। कर्णप्रयाग संगम पर माघ स्नान की यह स्मरणीय घड़ी श्रद्धालुओं के हृदय में लंबे समय तक जीवंत रहेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Uttarakhand

देहरादून : भाजपा के राष्ट्रीय सह-कोषाध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद डॉ. नरेश बंसल ने आज 9…